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फर्नाडीस ईसाई थे पर उनकी अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से होगा

चैनल हिंदुस्तान डेस्क: दुनिया से रुखसत कर गए प्रख्यात समाजवादी नेता और पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नाडीस वैसे तो इसाई थे, लेकिन उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किया जाएगा। आपके मन में भी सवाल होगा कि ऐसा क्यों? दरअसल, जॉज फर्नाडीस की करीबी रहीं जया जेटली की मानें तो फर्नाडीस ने खुद हिंदू रीति से अंत्येष्टि की मंशा जाहिर की थी। जया ने बताया कि फर्नाडीस ने कहा कि पहले हिंदू रीति से अंत्येष्टि की जाए और फिर उन्हें दफनाया जाए। इसलिए उनकी अंत्येष्टि हिंदू रीति-रिवाज से की जाएगी और उनकी अस्थियों व राख को दफनाया जाएगा। इस तरह उनकी अंतिम इच्छा अनुसार हिंदू व ईसाई धर्म दोनों की परंपरा से अंतिम सरकार किया जाएगा।

जार्ज पंचम पर मां ने रखा था नाम

देश की सियासत में अलग पहचान रखने वाले फर्नाडीस का जन्म तीन जून, 1930 को कर्नाटक के मंगलौर में एक ईसाई परिवार में हुआ था। फर्नाडीस की मां किग जॉर्ज पंचम की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं, इसलिए उन्होंने अपने छह बच्चों में से सबसे बड़े बेटे का नाम जॉर्ज फर्नाडीस रखा। वह 1967 से 2004 तक नौ लोकसभा चुनाव जीते। मंगलवार (29 जनवरी, 2019) को जॉर्ज फर्नाडीस इस दुनिया को छोड़कर चले गए।

बेहद खास था जॉर्ज-जया का रिश्ता, ऐसे जया आई थीं करीब

उसी दौर में जया के पति अशोक जेटली जॉर्ज के विशेष सहायक थे। यही वह समय था जब जया से उनकी मुलाकात हुई। जल्द ही वह उनके साथ काम करने लगीं। बीच के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के दौर गुजरे और फिर भाजपा के साथ गठबंधन की सरकार में जॉर्ज केंद्रीय मंत्री बने।
जॉर्ज फर्नाडीस और जया जेटली का रिश्ता बेहद खास था। जया के अनुसार, कई चीजों ने उन दोनों को एक साथ ला खड़ा किया था, लेकिन वह रोमांस नहीं था। जॉर्ज ने 1971 में लैला कबीर से शादी की थी। चार साल बाद ही देश में आपातकाल लागू हो गया। उस समय उनकी पत्नी अमेरिका चली गई और करीब दो साल तक दोनों में कोई संवाद नहीं हो सका। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में जॉर्ज केंद्रीय मंत्री बने। पत्नी लैला का कहना था कि जब वह लौटीं तो उन्होंने जॉर्ज को बेहद बदला-बदला सा पाया। इसके बाद उन्होंने तलाक मांगा, लेकिन जॉर्ज तैयार नहीं हुए।

जॉर्ज से मिलने के लिए जब जया को जाना पड़ा कोर्ट

बात 2010 की है। जॉर्ज बीमार हो गए और पत्नी लैला उनके पास लौट आईं। जॉर्ज अल्जाइमर से पीड़ित थे। जया चाहती थीं जॉर्ज से मिलना, लेकिन लैला ने एक समय उन्हें मिलने से रोक दिया। उनसे मिलने की अनुमति मांगने के लिए 2012 में जया ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष कोर्ट ने उन्हें हर 14 दिनों पर 15 मिनट के लिए मुलाकात की अनुमति दे दी।

नीतीश कुमार के साथ मिलकर अपराजेय लालू का मिथक तोड़ा

बिहार के मुख्यमंत्री की हैसियत से जब लालू प्रसाद 20 साल तक राज करने की बात कर रहे थे, उस दौर में वह अपराजेय मान लिए गए थे। लालू के शासन के तीसरे साल में जब जॉर्ज फर्नाडीस ने उन्हें सत्ता से बेदखल करने का एलान किया, तो किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि जमीनी सच्चाई को जानने वाले जॉर्ज आखिर क्या बोल रहे हैं। रही सही कसर 1995 के विधानसभा चुनाव ने पूरी कर दी। लालू को बेदखल करने के इरादे से चुनाव लड़ी समता पार्टी सात सीटों पर सिमट गई तो यही कहा गया कि जॉर्ज और उनके लोग घर बैठ जाएंगे। ऐसा हुआ नहीं। पराजय के बाद जॉर्ज और नीतीश कुमार ठोस रणनीति के साथ मैदान में आए। भाजपा से दोस्ती की। 2000 आते-आते लालू प्रसाद की सत्ता को चुनौती मिल चुकी थी। सात दिनों के लिए ही सही नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन चुके थे और यह मिथ टूट गया था कि लालू अपराजेय हैं।

केंद्रीय मंत्री के रूप में दो अहम फैसले

केंद्रीय मंत्री के रूप में वह दो फैसलों के लिए जाने जाते हैं। 1977 में उन्होंने कोका कोला व आईबीएम को भारत से बाहर कर दिया था और 2002 में देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी एचपीसीएल को बेचने की प्रक्रिया में अड़ंगा लगाया था। 1999 में रक्षामंत्री रहते हुए उन्होंने कारगिल से पाक सैनिकों को खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई थी।

तेज तर्रार श्रमिक नेता रहे

तेज तर्रार श्रमिक नेता और समाजवादी फर्नाडीस 1977 के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार में उद्योग मंत्री बनाए गए थे। तब उन्होंने शीतल पेय कंपनी कोका कोला व कंप्यूटर कंपनी आईबीएम को भारत से बाहर करने का फैसला लिया था। इन दोनों कंपनियों ने तत्कालीन विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम (फेरा) के प्रावधान का पालन करने में आनाकानी की थी, जिसके बाद यह कदम उठाया गया था। उस समय फर्नाडीस ने इसका स्वदेशी विकल्प ‘डबल सेवन’ (77) बाजार में उतारा था। 1993 में नरसिंहराव सरकार द्वारा भारतीय बाजार का उदारीकरण किए जाने के बाद ही कोका कोला फिर भारतीय बाजार में लौटी थी। एचपीसीएल के साथ बीपीसीएल को बचाया 25 साल बाद 2002 में फिर फर्नाडीस मोर्चे पर नजर आए। उस समय उन्होंने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) और भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के निजीकरण का विरोध किया था। वह तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री थे। केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद विनिवेश के खिलाफ बोलने से वे नहीं चूके। यहां तक कि उन्होंने बेचने की नीति को ‘धनी को और धनी और निजी एकाधिकार तैयार करने वाला’ बताया था।

1974 में रेल हड़ताल से चर्चित हुए

राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आए जब उन्होंने फायर ब्रांड ट्रेड यूनियन नेता रहते हुए 1974 में मुंबई में रेल हड़ताल कराई थी। संयोग ऐसा कि वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में 1989 में वह रेल महकमे के ही मंत्री बने थे। इस सरकार में अधिकांश वामपंथी नेता थे। संघ विरोधी पर अटल सरकार में रहे जॉर्ज फर्नाडीस आरएसएस के कट्टर आलोचक थे लेकिन उन्होंने भाजपा नीत राजग की अटल सरकार में 1998 व 1999 में रक्षा मंत्री पद संभाला था। उन्हीं के नेतृत्व में भारत ने कारगिल युद्ध लड़ा और 1998 में पोकरण में परमाणु परीक्षण किए थे। बड़ौदा डायनामाइट केस चला फर्नाडीस को 10 जून, 1976 को कोलकाता में गिरफ्तार कर उन पर बहुचर्चित बड़ौदा डायनामाइट मामले में केस चलाया गया था। उन पर तत्कालीन इंदिरा सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश में सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का भी मुकदमा चलाया गया था।

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