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क्या गोरखालैंड को भूल अमर सिंह राई को वोट देगी दार्जीलिंग की जनता?

-अजय कुमार झा
कभी गोरखालैंड की मांग पर पूरे पहाड़ (दार्जीलिंग) को अशांत कर देने वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता आज सबकुछ भुला कर ममता बनर्जी की शागिर्दी में लगे हैं। इनदिनों वे गोरखालैंड का नाम भी नहीं सुनना चाहते। अगर गलती से किसी ने ले लिया तो या तो उसे चुप करा देते हैं या खुद चुप्पी साध लेते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ जब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के विधायक पद से इस्तीफा देने कोलकाता पहुंचे अमर सिंह राई से पत्रकारों ने गोरखालैंड पर सवाल पूछा। श्री राई सवाल को अनसुना करके बात को घुमाते हुए दूसरा ही राग अलापने लगे। दरअसल अमर सिंह राई को तृणमूल कांग्रेस ने दार्जीलिंग से लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाया है।

श्री राई ने विधानसभा पहुंच कर विधनसभा के अध्यक्ष विमान बंद्योपाध्याय को अपना दार्जीलिंग से विधायक पद का इस्तीफा सौंपा। इसक बाद पत्रकारों से रूबरू हुए अमर सिंह राई से जब पूछा गया कि क्या चुनाव जीतने के बाद लोकसभा में गोरखालैंड की मांग को उठायेंगे? तो इसके जवाब में श्री राई ने कहा, ‘मैं गोरखा समुदाय को स्वीकृति देने की मांग करूँगा, क्योंकि पहाड़ पर गोरखा समुदाय के लोगों को भूमि अधिकार नहीं है। इसके अलावा और भी कई मांगें हैं, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। मुझे उन्हीं मांगों को उठाना होगा।’ पूरी बातचीत के दौरान उन्होंने गोरखालैंड काे जिक्र तक नहीं किया, बल्कि उस मुद्दे को ही हवा में उड़ा दिया।

ज्ञात हो कि 2016 में जब अमर सिंह राई को मोर्चा प्रमुख विमल गुरुंग ने दार्जीलिंग विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया था, उस समय भी गोरखालैंड की मांग पर ही श्री राई चुनाव लड़े थे। यहां तक कि चुनाव जीतने के बाद भी गोरखालैंड की मांग पर विधानसभा की कार्यवाही से बॉयकॉट करने को हाज़िर रहते थे, लेकिन विमल गुरुंग के दार्जीलिंग से चले जाने ले बाद अमर सिंह राई भी विनय तमांग के साथ तृणमूल कांग्रेस के साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगे। उसी रास्ते पर अब उन्हें दार्जीलिंग से तृणमूल कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया है। इसीलिए उन्हें ममता बनर्जी का निर्देश और उनकी पार्टी की विचारधारा को मान कर चलना पड़ेगा। शायद इसीलिए गोरखालैंड की मांग से श्री राई पीछे हट गये हैं। इसीलिए उनके पास गोरखालैंड के मसले से यू टर्न लेने के अलावा कोई चारा नहीं ।

लेकिन सवाल ये है कि पहाड़ की जनता जो गोरखालैंड को अधिकार मानती रही है। उसी की मांग पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का समर्थन करती आयी और चुनाव में जिताती आयी है। क्या वह जनता अमर सिंह राई की इस राजनीतिक कदम को आसानी से मान पायेगी? क्या करीब 110 वर्षों की मांग और आंदोलन को भुलाकर राज्य की सत्ताधारी पार्टी को वोट देगी?

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