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कविता – मैंने देखा था कुछ लड़कों को..

मैंने देखा था कुछ लड़को को
जो बिलकुल अंधविश्वासी न थे

नहीं मानते थे वो
कि बुरा होता है
बिल्ली का रास्ता काटना ,
मीठे मुँह कहीं बाहर जाना।

नहीं मानते थे वो
कि असर करता है
निम्बू मिर्चा दुआरे टांगना ,
लूण राइ से नज़र उतारना।

पर पुरे मैच के दौरान
कई कई बार उन्हें
मध्यमा को तर्जनी पर चढ़ाते देखा
मन में कुछ कुछ बड़बड़ाते देखा

वो फिंगरक्रॉस कर रहे थे
की कहीं धोनी न आउट हो जाए
ऐ काश की सही
ये नो बॉल का डाउट हो जाए।

मैंने देखा था कुछ लड़कों को
जो बिलकुल धार्मिक न थे

नहीं जाते थे वो
तीरथ या देवस्थान कभी,
पूजे ही न थे भगवान कभी

नहीं मानते थे वो
भजन कीर्तन भक्ति को,
प्रार्थनाओं की शक्ति को

पर पुरे मैच के दौरान
कई कई बार उन्हें
सुना था ओह गॉड और हे भगवान कहते
आँखें मीचे, हाथ जोड़े विनय गान कहते।

वो दुआ कर रहे थे
कि ज़ोरों की बरसात हो जाए
भारत की जीत
न्यूज़ीलैण्ड की मात हो जाए …

मैंने देखा था उन्हें दिलों को थामते,
असहाय किसी पीड़ा से कांपते,
मैंने देखा था उन्हें अपनी सुध बुध खोते
संवेदनशील लड़कियों की तरह होते ….

आखिर धैर्यता का वो किला ढह निकला
नयन कोर से एक आंसू बह निकला …..

मैंने देखा था उन्हें ग्रहणी की तरह सपने संजोते
व्याकुल प्रेमिका की तरह पलके भिगोते
किसी बच्चे की तरह कोने में छिपकर रोते
हाँ मैंने देखा था तब मर्द को भी दर्द होते

कारण चाहे जो हो
वो अहम तज जज़्बात दिखा रहे हैं
धीरे धीरे ही सही
बनावटी खोल से बाहर आ रहे हैं
बनावटी खोल से बाहर आ रहे हैं

कवियत्री - अनु नेवटिया
कवयित्री – अनु नेवटिया
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