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Movie Review: फिल्मी लेखा-जोखा: संघर्ष साहस और ज़िंदादिली का अचूक निशाना है “सांड की आँख”

कवयित्री - अनु नेवटियादिवाली के मौके पर रिलीज़ हुई ‘अनुराग कश्यप’ द्वारा निर्मित फिल्म “सांड की आँख” भारत की दो सबसे उम्रदराज शार्पशूटर्स ‘चंद्रो तोमर’ और ‘प्रकाशी तोमर’ की बायॉग्रफी है, जिन्हें शूटर दादी के नाम से भी जाना जाता है।

फिल्म की कहानी, निर्देशन और अभिनय से पहले मैं बात करना चाहूंगी इसके शीर्षक की।
“सांड की आँख”
सुनने में अटपटा लगता है, नहीं ?
और यही अगर अंग्रेजी में “Bulls eye” कहें तो ?
किसी भी निशानेबाज़ी के खेल में जब निशाना बिलकुल लक्ष्य के केंद्र पर लगता है तो उसे bulls eye shot कहते हैं , और शूटर दादी द्वारा किये गए हिंदी अनुवाद में इसे कहते है “सांड की आँख” ।

फिल्म 1959 से लेकर 2010 तक के बीच की कहानी है जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ग्रामीण परिवेश, घूँघट प्रथा , पुरुष प्रधान समाज , रूढ़िवादी परम्पराएं आदि का बखूबी चित्रण किया गया है।
आर्ट एंड सिनेमेटोग्राफी इतनी लाजवाब है की परदे पर एक गाँव का दृश्य बेहतरीन तरीके से उभर कर आता है।

फिल्म की कहानी है दो देवरानी जेठानी ‘चंद्रो तोमर’ और ‘प्रकाशी तोमर’ की , जिन्होंने गांव की पितृसत्तात्मक संरचना के बीच रहकर, अनेक परेशानियों को झेलते हुए साठ साल की उम्र में न सिर्फ शूटिंग सीखा, बल्कि उसमें अनेक पदक जीते और लाखों महिलाओं को प्रेरित किया।
और इसी का असर है की 2010 में इंग्लैंड में हुए ट्रैप इवेंट में भारत को पहला पदक जीताने वाली महिला खिलाडी “सीमा तोमर” इन्हीं के परिवार की बेटी है।

फिल्म में कुछ भी फ़िज़ूल या अति काल्पनिक नहीं दिखाया गया है, बायोग्राफी को एक कमर्शियल पिक्चर बनाने के लिए कुछ हलके फुल्के तथ्य ज़रूर जोड़े-घटाए गए हैं , पर इससे मूल कहानी अपनी जगह से नहीं हिली है, ये सबसे अच्छी बात है ।
हाँ पर कहानी में थोड़ा खिंचाव ज़रूर है जिसे और बेहतर एडिटिंग से कसा जा सकता था, जिससे की स्क्रीनप्ले में और निखार आता , पर एडिटर ‘देवेंदर मुर्देश्वर’ इसमें ज़रा से चूक गए।
फिर भी फिल्म का समग्र प्रभाव लाजवाब से कुछ भी कम नहीं।

निर्देशक तुषार हीरानंदानी की पकड़ एक-एक दृश्य पर साफ नज़र आती है।
एक ऐसा ग्रामीण परिवेश जहाँ औरत अपने घूँघट के रंग से पहचानी जाती है, और बच्चे पैदा करने की मशीन से अधिक उनका कोई अस्तित्व नहीं , को परदे पर यथावत बिना किसी अनावश्यक लीपा-पोती के दिखाना, निर्देशक और लेखक के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसमें वे दोनों पूरी तरह सफल हुए हैं।

फिल्म की खूबसूरती शूटर दादियों की ज़िंदादिली है , जिन्हें जब साठ साल की उम्र में ये पता चलता है की उनके अंदर निशानेबाज़ी की असाधारण प्रतिभा है तो वे न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपनी बेटियों और पोतियों के लिए भी लड़ती हैं। निशानेबाज़ी से भी कहीं ज़्यादा प्रभावित करता है इस उम्र में उनका ऐसा जोश और जज़्बा जो हर बाधा को पार कर एक नए समाज की संरचना करता है।
और इस खूबसूरती को अपने लाजवाब अभिनय से दर्शाया है भूमि पेडनेकर (चंद्रो ) और तापसी पन्नू (प्रकाशी) ने, अपनी उम्र से दोगुने व्यक्ति का किरदार निभाना आसान नहीं होता, ऊपर से हरियाणवी बोलचाल पकड़ना और भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण रहा होगा । मगर दाद देनी होगी इन दोनों अभिनेत्रियों की जिन्होंने इतनी सच्चाई और लग्न से इस किरदार को न सिर्फ निभाया बल्कि जिया । अगर इसमें कुछ खटकता है तो वह है इनका साठ साल के लुक वाला मेकअप जिसे अत्याधिक न दिखाकर थोड़ा और वास्तविकता के करीब रखा जा सकता था।

इसके अलावा ‘प्रकाश झा’ घर के मुखिया के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते हैं। डॉक्टर यशपाल के किरदार से ‘विनीत कुमार’ ने अपनी छाप छोड़ी है, और बाकी के सभी सहायक कलकार का अभिनय इस बात का प्रमाण है की अभिनय में कहीं से कोई कमी नहीं रही है।

क्यूंकि कहानी एक बायोग्राफी है, तो लेखक के पास अधिक से अधिक कुछ लिखने के लिए बचता है , तो वह है संवाद। जिसमें जगदीप सिद्धू ने बाज़ी मार ली।
कुछ छोटे छोटे हास्य दृश्य कहें या भावनात्मक दृश्य , पात्रों का संवाद एक परिपक्व लेखक का परिचय देता है और साथ ही कहानी के दृश्यों को विविधता भी प्रदान करता है जो मनोरंजन के लिए बेहद ज़रूरी है।

फिल्म के गाने ‘वूमनिया’ और ‘उड़ता तीतर’ औसत है पर काफी मज़ेदार और पॉपुलर है।

कुल मिलाकर अगर कमज़ोर एडिटिंग और खराब मेकअप को छोड़ दें तो सांड की आंख एक ऐसी फिल्म है जो आपके मन को प्रेरणा से भर देगी और इस बात का एहसास कराएगी की अगर आप वाकई अपने लिए कुछ करना चाहते हैं, कुछ सीखना चाहते हैं या बस केवल खुश ही रहना चाहते हैं तो “Age is just a number” and “fear is just a word”

कुछ खामियों के बावजूद फिल्म बहुत अच्छी बनी है और परिवार संग देखने लायक है। तो अगर आपने अब तक न देखा हो तो ज़रूर जाएँ और एन्जॉय करें।

Star Ratings-

IMDb (Internet Movies Database)- 8.5/10
Navbharat Times – 3.5/5
India Today – 3.5/5
Times of India – 3.5/5
Book My Show Audience Review – 8.7/10

-अनु नेवटिया

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