ये कैसी कुर्बानी कैसा बलिदान है

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कवयित्री- अनु नेवटिया

मुस्लिम की कटार हो
या हिन्दू की तलवार हो
कुर्बानी का हो दिन
या बली प्रथा प्राचीन
सर क्यों उसी का काटा जाता है
जिससे नहीं कोई तेरा नाता है
ये कैसी कुर्बानी कैसा बलिदान है
हे! हाड़ मांस के पुतले
क्या वाकई तू इंसान है?

किसी जीव को घर लाना
हाथों से खिलाकर खाना
गर्दन पर तब छुरी चलाकर
अपने पेट की आग बुझाना
क्या यही तुम्हारा इस्लाम है?
जहाँ खून नहीं
बस पानी बहाना हराम है।
“करो सड़के लाल” कहता कुरआन है?
या ये हैवानियत अल्लाह का पैगाम है?

खुदकी थाली में जान सजाकर
दूजे को कातिल ठहराना
इतना आसान भी नहीं तेरा
यूँ बचकर निकल जाना
है वो कसाई तो तू भी तो हैवान है
ना वो मानव ही है ना ही तू इंसान है
गर दफ़न है मृत शरीर तेरे अंदर
तो शमशान है तू केवल शमशान है

बच्चे तुम्हारे भी दूध ही पीते हैं
रक्त पीना तो तुम सिखाते हो
फिर क्यों गाय को माता नहीं
भोजन की तरह दिखाते हो

चलो उनके लिए तो सामान है
जिसे वो खरीद लाते हैं
पर जिनके धर्म में भगवान है
वो कैसे बेच पाते हैं?
अब ये न कहना की लाचार थे
बच्चे भूखे, पिता बीमार थे
बुज़दिल हो तुम
हरगिज़ नहीं मजबूर
अच्छा होता कर लेते
भूख से मरना मंजूर

जहां इंसान की कीमत नहीं
जानवर की क्या बिसात है
कोई कमज़ोर ताकतवर कोई
ये वक़्त वक़्त की बात है
पर न भूलो उस जहां में
देना तुम्हें जवाब है
रखा हुआ वहां तेरे
हर निवाले का हिसाब है।

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